जीवन के संगर्ष पटल पर
बैठा बैठा सोच रहा मैं
तुमसे कह दूँ या न बोलूं
हृदय की वो साड़ी बात
जो है मन में आग लगाये
जिसका नही तुम्हे आभास
मन की सारी पीड़ा कह दूँ
तपन हृदय की कर लूँ शांत
सहज करुँ में तुमसे बातें
वृहद् बनाऊं यह संताप
ओझल हो जाए ये पीड़ा
मिट जाए मन का संग्राम
मीलन की हों बातें पुरी
या फिर न हो ये वृत्तांत
य्दी बची हो कोई बात
सहज बताओ मुझको आज
चीनतन कर मैं तुम्हे बताऊँ
उस पीड़ा का अवसाद
Friday, April 10, 2009
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5 comments:
ओझल हो जाए ये पीड़ा
मिट जाए मन का संग्राम
मिलन की हों बातें पुरी
या फिर न हो ये वृत्तांत
बहुत ही सुंदर कविता. शुभकामनाएं.
रामराम.
हिंदी ब्लॉग की दुनिया में आपका सादर स्वागत है....
बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
यदि बची हो कोई बात
सहज बताओ मुझको आज
चिन्तन कर मैं तुम्हे बताऊँ
उस पीड़ा का अवसाद
बहुत खूब। कहते हैं कि-
शहर में आया तो लाया अपने साथ चराग की मौत।
वही चराग जो सिसकता रहा शहर के लिए।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
blog jagat mein aapka swaagat hai. aapne prabhaavit kiya , yun hee likhte rahein.
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